फ़िराक़ गोरखपुरी आज ‘ फ़िराक़ ’ गोरखपुरी की जन्मतिथि है। ‘ फ़िराक़ ’ उर्दू के पहले रचनाकार हैं , जिनको उनकी कृति ‘ गुल - ए - नग़्मा ’ के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। इसी कृति के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार और सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड से भी सम्मानित किया गया। :पेश-ए-नजर फिराक़ के कुछ कलाम: 1. ज़िन्दगी क्या है , ये मुझसे पूछते हो दोस्तों . एक पैमाँ१ है जो पूरा होके भी न पूरा हो . बेबसी ये है कि सब कुछ कर गुजरना इश्क़ में . सोचना दिल में ये , हमने क्या किया फिर बाद को . रश्क़ जिस पर है ज़माने भर को वो भी तो इश्क़ . कोसते हैं जिसको वो भी इश्क़ ही है , हो न हो . आदमियत का तक़ाज़ा था मेरा इज़हारे - इश्क़ . भूल भी होती है इक इंसान से , जाने भी दो . मैं तुम्हीं में से था कर लेते हैं यादे - रफ्तगां२ . यूँ किसी को भूलते हैं दोस्तों , ऐ दोस्तों ! यूँ भी देते हैं निशान इस मंज़िले - दुश्वार का ....