लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है।
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में।
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
शुक्रवार, 3 सितंबर 2010
गुरुवार, 12 अगस्त 2010
कवि का स्मरण : आर सी प्रसाद शर्मा
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| झरना |
जीवन का झरना
यह जीवन क्या है ? निर्झर है
मस्ती ही इसका पानी है ,
सुख दुःख के दोनों तीरों से, चल रहा राह मनमानी है निर्झर में गति है, यौवन है , वह आगे बढ़ते जाता है
धुन सिर्फ है चलने की , अपनी मस्ती में गाता है
निर्झर में गति ही जीवन है ,रुक जाएगी
यह गति जिस दिन
उस दिन मर जाएगा मानव , जग दुर्दिन घड़ियॉ गिन-गिन
चलना है -केवल चलना है , जीवन चलता ही रहता है
मर जाना है रुक जाना ही, निर्झर यह झरकर कहता है
आर सी प्रसाद --- छायावादी युगीन राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना के कवि हैं आर सी प्रसाद का जन्म 19 अगस्त 1911 को बिहार के दरभंगा जिले में हुआ प्रारंभ में मुंगेर में अध्यापक के रूप में काम किया , बाद में आकाशवाणी में हिंदी कार्यक्रमों के आयोजक के तौर पर जुड़े प्रसाद जी ने द्विवेदी युग में लेखन शुरू किया और छायावादी युग में रचनाएं प्रकाशित होने लगी , हिंदी के अतिरिक्त ' मैथिली' में भी लेखन किया मैथिली की रचना ' सूर्यमुखी' को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला | कवि के जन्म दिवस के अवसर पर उनकी रचना ' जीवन का झरना ' पोस्ट कर रहा हूँ |
शनिवार, 7 अगस्त 2010
त्रिलोचन स्मरण
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| त्रिलोचन |
वही त्रिलोचन है, वह – जिसके तन पर गन्दे
कपड़े हैं। कपड़े भी कैसे – फटे लटे हैं
यही भी फ़ैशन है, फ़ैशन से कटे कटे हैं।
कौन कह सकेगा इसका यह जीवन चन्दे
उठा हुआ सिर, चौड़ी छाती, लम्बी बाहें,
सधे कदम, तेज़ी, वे टेढ़ी मेढ़ी राहें
मानो डर से सिकुड़ रही हैं, किस का किस का
ध्यान इस समय खींच रहा है...
स्मरण: नुसरत फ़तेह अली खान
नागार्जुन जन्मशति : सावन अभिनंदन:
गालियां देते थे तुम्हें
हताश खेतिहर,
धूल में नहाते थे
गौरेयों के झुंड,
अभी कल तक
पथराई हुई थी
धनहर खेतों की माटी,
अभी कल तक
दुबके पडे थे मेंढक,
उदास बदतंग था आसमान !
और आज
ऊपर ही ऊपर तन गए हैं
तुम्हारे तम्बू ,
और आज
छ्मका रही है पावस रानी ,
बूंदा-बूंदियों की अपनी पायल,
और आज
चालू हो गई है
झींगुरों की शहनाई अविराम ,
और आज
आ गई वापस जान
दूब की झुलसी शिराओं के अंदर ,
और आज
विदा हुआ चुपचाप ग्रीष्म
समेट कर अपने लव–लश्कर...
गुलशन बावरा तुम बहुत याद आये
हमें और जीने की चाहत न होती
अगर तुम न होते , अगर तुम न होते
हमें जो तुम्हारा सहारा न मिलता
भंवर में ही रहते किनारा न मिलता....
स्मरण: सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
वह चुप रहता था,
जब सब चलते थे
जब सब खाने पर टूटते थे
वह अलग बैठा टूँगता रहता था,
जब सब निढाल हो सो जाते थे
वह शून्य में टकटकी लगाए रहता था
लेकिन जब गोली चली
तब सबसे पहले
वही मारा गया...
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