मंगलवार, 5 जुलाई 2011

रविन्द्र जैन : संगीत मे बसा गीतकार




सुपरिचित संगीतकार रविन्द्र जैन का जन्म ग्राम लोहरिया,राजस्थान मे हुआ । आरंभिक शिक्षा संस्कृत व आयुर्वेद गुरु पंडित इंद्रमनी जैन के सान्निध्य मे हुई । रविन्द्र के परिवार मे माता-पिता के साथ सात भाई व एक बहन थी, भाई-बहनो मे इनका स्थान तीसरा है । संगीत की शिक्षा उन्हे पं जी एल जैन,पं जनार्दन शर्मा तथा पं नाथुराम से संयुक्त रूप से प्राप्त हुई । इसके बाद वह कोलकाता पहुंचे और फ़िर अंतत: मुंबई, मायानगरी ने रविन्द्र के कैरियर को स्वपन भरा मुकाम दिया।


रविन्द्र जैन का संगीत सफ़र अब भी जारी है, आज से करीब तीस-चालीस वर्ष पूर्व शुरु हुआ कैरियर ‘एक विवाह ऐसा (राजश्री प्रोडक्शन) तक कायम रहा है । बतौर संगीत निर्देशक ‘ चोर मचाए शोर’ (1974) पहली फ़िल्म थी । इसके बाद गीत गाता चल (1975), चितचोर (1976), अंखियो के झरोखे से (1978) एवं अमिताभ अभिनीत ‘ सौदागर ’ जैसी फ़िल्मो मे भी अपनी सेवाएं दी । अपने सफ़ल कैरियर मे रविन्द्र को आर के फ़िल्मस (राज कपूर), राजश्री प्रोडक्शन, क्षेत्रीय सिनेमा, धार्मिक फ़िल्म तथा टेलीविज़न मे सेवाएं देने का अवसर मिला। हिन्दी फ़िल्मो मे राजश्री बैनर के लिए अनेक फ़िल्मे की ,इसमे नदिया के पार, नैय्या, गीत गाता चल, चितचोर ,अंखियों के झरोखे से, विवाह और एक विवाह ऐसा भी का यहां उल्लेख किया जा सकता है। राज कपूर के बैनर तले बनने वाली : राम तेरी गंगा मैली तथा ‘हिना’ भी रविन्द्र जी के अच्छे काम के लिए याद की जाती है ।



रविन्द्र ने पार्श्व गायक येसुदास के साथ टीम बनाई, बासु भट्टाचार्य की ‘चितचोर’ और फ़िर ‘नैय्या’ मे इस टीम ने अच्छे गीत दिए । येसुदास को अभिनेता अमोल पालेकर(चितचोर) की आवाज़ के रूप मे विशेष ख्याति मिली। फ़िल्म के ‘जब दीप जले आना’ और ‘गोरी तेरा गांव’ आज भी पहचान बनाए हुए हैं। रविन्द्र येसुदास की सुरों से बहुत प्रभावित रहे, हिन्दी फ़िल्मो मे येसुदास जैसे समर्थवान गायक को लाने का श्रेय इन्हे ही जाता है। किस्सा बासु दा की ‘चितचोर’ का है, अभिनेता अमोल पालेकर की आवाज़ के लिए रविन्द्र को नए गायक की तलाश थी।येसुदास मे उन्हे एक नई आवाज़ मिली, सभी जानते है कि ‘चितचोर’ के गीत आज भी सुने जाते है।



अपने कैरियर मे अनेक धार्मिक –मिथक फ़िल्मो मे संगीत दिया, साथ ही टेलीविज़न मे भी सक्रिय रहे । टी वी धारावहिको मे ‘रामायण’, ‘लव-कुश’ ,‘अलिफ़ लैला’, ‘दादा-दादी की कहानियां’, ‘सांई बाबा’, ‘श्री कृष्णा’, ‘नुपूर’, ‘उर्वसी’, ‘जय हनुमान’, ‘जय गंगा मैया’, ‘महिमा शनि देव की’, ‘जय मां वैष्णो देवी’ और ‘ भारत के महान संत’ के लिए संगीत तैयार किया। अपने दीर्घ टीवी कैरियर मे ‘सागर आर्ट्स (रामानंद सागर) के साथ सबसे अधिक काम किया। रविन्द्र जी के सिने कैरियर मे संगीत के हर क्षेत्र का समन्वय रहा ,उनके सफ़र मे सिनेमा और टेलीविज़न का अच्छा संतुलन भी देखा जा सकता जा सकता है ।



रविन्द्र जैन की संगीतकार शख्सियत के बारे मे जानने के बाद, श्रोता उनमे मौजूद ‘गीतकार’ को भी जानना चाहेंगे। यह कम ही लोग जानते है कि रविन्द्र जैन एक शानदार गीतकार भी हैं। धुनों की यात्रा मे रविन्द्र की लेखन ‘दक्षता’ को भुलाया नही जा सकता, गीतों की धुन तैयार करने के साथ गीत गढने मे भी वह पारंगत हैं । फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार इतिहास मे ‘अंखियों के झरोखे से गीत पर ‘बेस्ट गीत’ का नामांकन मिला, यह गीत रविन्द्र की ही रचना है । फ़िर राजकपूर की ‘हिना’ के शीर्षक गीत ‘ मैं हूं खुशरंग हिना’को भी इस श्रेणी मे नामांकित किया गया।



रविन्द्र जैन: कुछ उल्लेखनीय गीत



• मैं हूं खुशरंग हिना (हिना)

• धरती मेरी माता,पिता आसमान (गीत गाता चल)

• श्याम तेरी बंसी पुकारे राधा नाम (गीत गाता चल)

• अंखियों के झरोखे से तुमने जो देखा (अंखियों के झरोखे से)

• जब दीप जले आना (चितचोर)

• कौन दिशा मे लेकर चला (नदिया के पार)

सोमवार, 16 मई 2011

प्रकाश मेहरा : हँसता हुआ जो चला गया

हिंदी फिल्मो के सुपरचित फिल्मकार  प्रकाश मेहरा का जन्म उत्तरप्रदेश के बिजनौर में हुआ था| प्रकाश जी ने 50 के दशक में अपने फिल्मी जीवन की शुरूआत 'प्रोडक्शन कंट्रोलर'  की हैसियत से की थी. 1968 में उन्होंने शशि कपूर,बबिता  की फिल्म हसीना मान जायेगी(कोमेडी) का निर्देशन किया जिसमें शशि कपूर ने 'डबल' रोल किया था |इसके बाद 1971 में उन्होंने में मेला का निर्देशन किया जिसमें फ़िरोज़ खान  और संजय खान ने मुख्य भूमिका निभाई थी| 1973 में उन्होंने अमिताभ बच्चन ,प्राण,जया भादुरी,   को लेकर ज़ंजीर का निर्माण और निर्देशन किया. यह फिल्म जबरदस्त हिट रही और इस फिल्म ने अमिताभ के डवांडोल कैरियर को पटरी पर ला दिया| इस फिल्म से अमिताभ के साथ प्रकाश मेहरा का रिश्ता गहरा हो गया और दोनों ने लगातार सात 'सुपरहिट' फिल्में दी |प्रकाश मेहरा ने बाद में ज़िन्दगी एक जुआ  फिल्म बनाई, अनिल कपूर  और माधुरी जैसे स्टारों के बावजूद यह फिल्म कमाल नहीं दिखा पाई|1996 में  वापसी की कोशिश में प्रख्यात अभिनेता राजकुमार  के बेटे पुरु राजकुमार को लेकर ब्रह्मचारी बनाई, लेकिन यह फिल्म भी 'असफल' रही| यह उनके निर्देशन की आखिरी फिल्म थी| बाद में उन्होंने मिथुन चक्रबर्ती दलाल फिल्म का निर्माण किया, एक सफल फिल्म साबित हुई| इसके बाद फिल्मे नहीं की |

इंडियन  मोशन पिक्चर्स डायरेक्टर्स एसोसिएशन ने 2006 में प्रकाश मेहरा को  'लाइफ टाइम्स अचिवेमेंट 'अवार्ड से सम्मानित किया,फिर सन 2008 में इसी संस्था ने उन्हें 'प्रोडूसर' से रूप में यह अवार्ड दिया |

17 मई 2009 को निमोनिया और दूसरी बीमारियों के कारण मुंबई में उनकी मृत्यु हो गई |

रविवार, 9 जनवरी 2011

अहमद फ़राज़ : कलाम मे लहू है !

अहमद फ़राज़ 
ख्वाब मरते नही

ख्वाब दिल हैं, ना आखें, ना सांसे के जो

रेज़ा-रेज़ा हुए तो बिखर जाएंगे

जिस्म की मौत से यह भी मर जाएंगे !


ख्वाब मरते नही

ख्वाब तो रोशनी हैं, नवां हैं, हवा हैं

जो काले पहाडों से रुकते नही

खवाब तो हर्फ़ हैं

ख्वाब तो नूर हैं !

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रंज़िश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ


आ फ़िर से मुझे छोड के जाने के लिए आ


जैसे तुझे आते हैं ना आने के बहाने

वैसे ही किसी रोज़ ना जाने के लिए आ


इक उम्र से हूं लज़्ज़त-ए-गिरिया से भी महरुम

अए राहत-ए-जान मुझ को रुलाने के लिए आ


अब तक दिल-ए-खुश फ़हम को तुझसे हैं उम्मीदें

यह आखिरी शम्मे बुझाने के लिए आ |


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इससे पहले के बेवफ़ा हो जाएं


क्यूं ना अए दोस्त हम जुदा हो जाएं


अगर मंज़िले ना बन पाएं

मंज़िलो तक का रास्ता हो जाएं |

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आज इस शहर , कल उस शहर का रास्ता लेना


यह सफ़र जितना मुसलसिल है के थक-हार के मैं

बैठ जाता हूं जहां छांव घनी होती है

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जब के सबके वास्ते लाएं हैं कपडे सेल से


लाए हैं मेरे लिए कैदी का कम्बल जेल से

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तु वहीं हार गया था मेरा बुज़दिल दुश्मन


मुझसे तन्हा के मुकाबिल तेरा लश्कर निकला

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यही कहा था मेरी आंख देख सकती है


तो मुझ पे टूट पडा सारा शहर नाबीना

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आशना हांथ ही मेरी ज़ानिब लपके


मेरे सीने में मेरा अपना ही खंजर उतरा |

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इक तो ख्वाब लिए फ़िरते हो गलियों – गलियों


उस पे तकरार भी करते हो खरीदार के साथ |

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मेरा कलाम नही किरदार उस मुहाफ़िज़ का


जो अपने शहर को मशहूर करके नाज़ करे |

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अब तो शायर पे भी कर्ज़ मिट्टी का है

अब कलाम मे लहू है सियाही नही |

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निसार मैं तेरी गलियो पे, अए वतन के जहां

चली है रश्म , के कोई ना सर उठा कर चले |
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शायर अहमद फ़राज़ की जन्मतिथि 14 जनवरी पर उनकी कलाम को तस्लीम करते हुए |

रविवार, 2 जनवरी 2011

टाटा जागृति यात्रा : आप खुद वो बदलाव बन जाओ जिसे आप लाना चाहते हो

मुम्बई: हर साल 24 दिसम्बर को 400 युवा भारतीयों को लेकर एक ट्रेन चलती है--सभी युवा भारत की आशाएं, आकांक्षाओं और चैतन्य के साक्षी बन चलते हैं |हर साल कि तरह इस वर्ष भी टाटा जागृति यात्रा अपने मंजिल को जाने को तत्पर है |इस साल भी यह यात्रा 24 दिसम्बर को मुंबई से रवाना हुई | यात्रा में करीब 400 युवा शामिल हो रहे हैं। इस राष्ट्रव्यापी यात्रा मे युवाओं को उन वास्तविक ‘हीरो’ से मिलने का अवसर मिलेगा जिन्होंने अपने नवीन सोच से सामाजिक और व्यावसायिक क्षेत्र में न सिर्फ बदलाव लाने की पहल की है बल्कि अपने प्रयासों में वे सफल भी हो रहे हैं।

यात्रा का उद्देश्य युवाओं में सामाजिक एवं व्यावसायिक क्षेत्र की उद्यमशीलता जागृत करना है और उन्हें वैसे लोगों से मिलाना है जिन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर अथवा एक संगठन के रूप में उन चुनौतियों का समाधान उपलब्ध कराया है जिन चुनौतियों का सामना वर्तमान समय में हम कर रहे है।

टाटा जागृति यात्रा युवाओं को प्रेरित कर समुदाय और देश के लिए कुछ करने के लिये प्रोत्साहित करना चाहती है।इस अनोखी यात्रा का हिस्सा बनने के लिए भारत और विदेशों में रहने वाले नौजवानों ने भारी उत्साह दिखाया है । इस वर्ष यात्रा के लिये निर्णायक मंडल द्वारा 400 यात्रियों का चयन कर लिया गया है। यह सभी इस राष्ट्रीय यात्रा के ज़रिए ऐसे व्यक्तियों से मिलेंगे जिन्होंने विपरीत स्थितियों में भी अपार ‘सफ़लता’ अर्जित की है। यात्रा का उद्देश्य एक आम भारतीय युवा में ‘सामाजिक बदलाव और उद्यमशीलता शक्ति’ का संचार करना है ।

आज का युवा बाज़ार की चमक-दमक से इतना प्रभावित है कि वो उन लोगों को देख ही नहीं पाता जो वास्तव में हमारे आदर्श होने चाहिये। टाटा जागृति यात्रा 2010 ऐसे ही लोगों की कहानियों से यात्रियों को रु-ब-रु करेगी | मुलाकात यात्रियों का जीवन प्रभावित करने में ही नहीं, बल्कि बदलने में भी सक्षम होगी । जागृति यात्रा मीडिया के माध्यम से अपने संदेश को उन तमाम युवाओं तक पहुँचाएगी जिन्हें किसी कारण वर्ष यात्रा में भाग लेने का अवसर नही मिला । यात्रा हर ही साल ऐसे सभी युवाओं तक ‘मानवीय विज़न शक्ति’ का संदेश पहुंचाती है |


यात्रियों को उनके द्वारा प्रदर्शित उद्यमशीलता की ‘अदभुत भावना’ प्रदर्शन आधार पर चयनित किया जाता है। यात्रियों मे वैसे लोगों को यात्रा में शामिल करने पर बल दिया जाता है, जो अपने क्षेत्र में परंपराओं से हटकर कुछ नया और बेहतर करने की कोशिश में लगे हैं।

यात्रा मुंबई से 24 दिसंबर 2010 को रवाना हुई और 18 दिनों में 8000 किमी की यात्रा पूरी कर 11 जनवरी 2011 को मुंबई लौट आएगी। इस दौरान यात्री विभिन्न स्थानों पर कार्यरत उद्यमियों और उनके संस्थानों की सफलता से रू-ब-रू होंगे |

टाटा जागृति यात्रा 2010 का अनुभव 400 यात्रियों पर तो सीधा असर डालेगा ही, साथ ही साथ, लगभग 15000 वो लोग भी प्रभावित होंगे जिन्होंने यात्री बनने हेतु इस ‘देशव्यापी अभियान’ से संपर्क किया है । टाटा यात्रा विभिन्न नेटवर्कों के सहारे लगभग 25000 से भी अधिक लोगों तक अपनी बात पहुँचा सकेगी।

टाटा जागृति यात्रा भारत की तमाम भौगोलिक, सांस्कृतिक, सामाजिक परतों में जाकर सक्रिय भागीदारी बटोरने की मुहिम छेड चुकी हैं। जहाँ एक ओर राष्ट्रीय प्रेस मदद कर रही है, वहीं स्थानीय अखबार भी इस पवित्र उद्देश्य हेतु कार्यरत है। प्रेस के अलावा रेडियो, विकास इकाइयों और कॉलेजों उत्सवों में पहुँच कर अपनी बात ज़ोर-शोर से बता रही है

टाटा यात्रा--आयु सीमा: प्रतिभागी--20 से 25 वर्ष तथा टीम लीडर--25 वर्ष से अधिक

शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।

मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है।
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में।
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।

जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

कवि का स्मरण : आर सी प्रसाद शर्मा

झरना

  जीवन का झरना  

यह जीवन क्या है ? निर्झर है

 मस्ती ही इसका पानी है ,
सुख दुःख के दोनों तीरों से, चल रहा राह मनमानी है
निर्झर में गति है, यौवन है , वह आगे बढ़ते जाता है
धुन सिर्फ है चलने की , अपनी मस्ती में गाता है
निर्झर में गति ही जीवन है ,रुक जाएगी

यह गति जिस दिन
उस दिन मर जाएगा मानव , जग दुर्दिन घड़ियॉ गिन-गिन
चलना है -केवल चलना है , जीवन चलता ही रहता है
मर जाना है रुक जाना ही, निर्झर यह झरकर कहता है
आर सी प्रसाद --- छायावादी युगीन राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना के कवि हैं आर सी प्रसाद का जन्म 19 अगस्त 1911 को बिहार के दरभंगा जिले में हुआ प्रारंभ में मुंगेर में अध्यापक के रूप में काम किया , बाद में आकाशवाणी में हिंदी कार्यक्रमों के आयोजक के तौर पर जुड़े प्रसाद जी ने द्विवेदी युग में लेखन शुरू किया और छायावादी युग में रचनाएं प्रकाशित होने लगी , हिंदी के अतिरिक्त ' मैथिली' में भी लेखन किया मैथिली की रचना ' सूर्यमुखी' को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला | कवि के जन्म दिवस के अवसर पर उनकी रचना ' जीवन का झरना ' पोस्ट कर रहा हूँ |

शनिवार, 7 अगस्त 2010

त्रिलोचन स्मरण

त्रिलोचन
वही त्रिलोचन है, वह – जिसके तन पर गन्दे

कपड़े हैं। कपड़े भी कैसे – फटे लटे हैं

यही भी फ़ैशन है, फ़ैशन से कटे कटे हैं।

कौन कह सकेगा इसका यह जीवन चन्दे

पर अवलम्बित है। चलना तो देखो इसका

उठा हुआ सिर, चौड़ी छाती, लम्बी बाहें,

सधे कदम, तेज़ी, वे टेढ़ी मेढ़ी राहें

मानो डर से सिकुड़ रही हैं, किस का किस का

ध्यान इस समय खींच रहा है...